Jaa Chuki Hai

ढूंढता हूं जिसमें मुकम्मल इश्क़ अपना,

वो रातें वीरान करके जा चुकी है,

ए ज़िंदगी तेरा तजुर्बा फ़क़त नहीं है,

वो सांसे तमाम करके जा चुकी है,

उसके हक़ में था मुझे बर्बाद करना,

इसलिए नीलाम कर के जा चुकी है,

मेरी कीमत इतनी आसान नहीं है,

मगर चेहरे से बदनाम करके जा चुकी है,

ढूंढता हूं जिसमें मुकम्मल इश्क़ अपना,

वो रातें वीरान करके जा चुकी है,

 

 – Himank Bhardwaz